मध्य पूर्व युद्ध के प्रभाव से बढ़ती कीमतें पिछले महीने थोड़ी राहत लगती हुई दिख रहीं, लेकिन इसके पीछे और भी ज़िद्दी मुद्रास्फीति का दबाव छिपा हुआ है। जुलाई के उपभोक्ता मूल्य वृद्धि दर तीन महीने में 2% के स्तर पर गिर गई, लेकिन मुख्य मुद्रास्फीति संकेतक यानी मूल मुद्रास्फीति 2 साल 7 महीने में सबसे बड़ी वृद्धि दर्ज कर रही है, जिससे सतर्कता बरतनी पड़ रही है।
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने आज (4 तारीख को) जारी '7 महीने की उपभोक्ता मूल्य प्रवृत्ति' के अनुसार, पिछले महीने की उपभोक्ता मूल्य वृद्धि दर 2.8% रही। यह लगातार दो महीने 3% के स्तर (मई 3.1%, जून 3.2%) के बाद तीन महीने में 2% के स्तर पर लौटा है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक 119.77 (2020=100) रहा, जो एक साल पहले की तुलना में 2.8% बढ़ा है।
मूल्य स्थिरता में मुख्य भूमिका मध्य पूर्व युद्ध के प्रभाव से तेजी से बढ़े तेल के मूल्यों की वृद्धि दर में कमी आने से रही। जुलाई में तेल के मूल्य में 15.5% की वृद्धि हुई, जो जून (24.7%) की तुलना में बहुत कम है। वस्तु के आधार पर देखें तो डीजल में 21.5% (जून 33.7%), पेट्रोल में 12.6% (जून 23.1%) की वृद्धि हुई। इससे तेल के मूल्य वृद्धि में योगदान 0.60% (p) रहा, जो जून (0.93%p) की तुलना में कम है।

वित्त और अर्थव्यवस्था मंत्रालय ने अनुमान लगाया कि सरकार की तेल की अधिकतम कीमत नीति ने जुलाई की उपभोक्ता मूल्य वृद्धि दर को 0.3%p कम किया। यदि अधिकतम कीमत नीति नहीं होती तो जुलाई में मूल्य 3.1% तक पहुंच जाते। इस तरह सरकार की नीतिगत हस्तक्षेप भी कुल मूल्य वृद्धि दर को कम करने में मदद कर रहा है।